खैरागढ़ - अंकित महोबिया - पद्मावतीपुर ग्राम पंचायत में सामने आए वित्तीय अनियमितता के मामले में प्रशासन की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। जांच के बाद पंचायत सचिव गजेंद्र देवांगन को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन पूरे प्रकरण में सरपंच पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं किए जाने से ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संबंधित भुगतान नकद नहीं, बल्कि चेक के माध्यम से किया गया था। पंचायत नियमों के अनुसार चेक से भुगतान तभी संभव है जब उस पर सचिव और सरपंच दोनों के संयुक्त हस्ताक्षर हों। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि भुगतान संयुक्त हस्ताक्षर से हुआ है तो जिम्मेदारी केवल सचिव की कैसे तय की जा सकती है? पंचायती राज व्यवस्था में वित्तीय लेन-देन एकल नहीं बल्कि संयुक्त जिम्मेदारी के अंतर्गत आता है। चेक जारी करने की प्रक्रिया, बैंक में प्रस्तुतिकरण, भुगतान की स्वीकृति एवं राशि आहरण इन सभी चरणों में सरपंच की भूमिका अनिवार्य मानी जाती है। बावजूद इसके जांच रिपोर्ट में सरपंच की भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट टिप्पणी या कार्रवाई सामने नहीं आई है, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि कार्रवाई को कर्मचारी स्तर तक सीमित रखकर जनप्रतिनिधि को बचाने का प्रयास किया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि वित्तीय अनियमितता हुई है तो दोष तय करते समय पद नहीं, बल्कि भूमिका और जिम्मेदारी को आधार बनाया जाना चाहिए। गांव के लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की दोबारा निष्पक्ष जांच कराई जाए और सरपंच की भूमिका की भी स्पष्ट पड़ताल की जाए। उनका कहना है कि बिना संयुक्त हस्ताक्षर के चेक से भुगतान संभव नहीं है, ऐसे में केवल सचिव को निलंबित करना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता। अब देखना होगा कि प्रशासन संयुक्त जिम्मेदारी के सिद्धांत के आधार पर मामले की पुनः समीक्षा करता है या नहीं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए दोषियों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई की जाएगी, ताकि पंचायत व्यवस्था में विश्वास कायम रह सके।
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