खैरागढ़। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग तथा कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा के संरक्षण में “पुरालिपि एवं पुरालेख अध्ययन” विषय पर सात दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ सोमवार को हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। इस अवसर पर कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा, कार्यशाला निर्देशक एवं कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. (डॉ.) राजन यादव, विषय विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर (भूतपूर्व निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मैसूर), प्रभारी कुलसचिव श्री वेंकट रमन गुड़े तथा संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे उपस्थित रहे. संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे ने स्वागत भाषण में कार्यशाला के उद्देश्य और स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इतिहास और अतीत की समझ वर्तमान समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने इराक, मेसोपोटामिया और भारत की प्राचीन सभ्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पुरालिपियों के माध्यम से ऐतिहासिक ज्ञान अर्जित कर विद्यार्थी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को गहराई से समझ सकते हैं।
कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ पुरातात्विक दृष्टि से समृद्ध प्रदेश है। विद्यार्थियों को विशेषज्ञों के व्याख्यान से अधिकाधिक लाभ लेने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने सिरपुर की अपनी हालिया यात्रा का उल्लेख किया और प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत पर प्रकाश डाला . विषय विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर ने भारत की अभिलेखीय परंपरा की महत्ता बताते हुए अभिलेखीय साक्षरता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्राचीन अभिलेख हमारी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित और समझा जाना आवश्यक है, ताकि वे विस्मृति में न खो जाएं। उन्होंने छत्तीसगढ़ को अभिलेखीय संपदा से परिपूर्ण बताते हुए इसकी सराहना की। कार्यक्रम के अंत में प्रो. (डॉ.) राजन यादव ने कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों का पाठ करते हुए प्रेरक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि हमारी पहचान और जड़ों का आधार है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कौस्तुभ रंजन ने किया। अंत में प्रभारी कुलसचिव वेंकट आर. गुडे ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

