डोंगरगढ़ -सोन कुमार सिन्हा - ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की असली पहचान शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से होती है, लेकिन हाल के वर्षों में एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। कई गांवों में जहां नए स्कूल, कॉलेज, पुस्तकालय और खेल मैदानों की सख्त जरूरत है, वहीं कुछ स्थानों पर शराब दुकानों की मांग अधिक मुखर होकर सामने आ रही है। यह स्थिति न केवल ग्रामीण विकास पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा कर रही है। ग्रामीण भारत की तरक्की का सबसे मजबूत आधार शिक्षा को माना जाता है। एक विद्यालय सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं होता, बल्कि वह बच्चों के सपनों, संस्कारों और भविष्य की नींव तैयार करता है। इसके बावजूद आज भी अनेक गांव ऐसे हैं जहां पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कहीं स्कूल भवनों की कमी है तो कहीं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दूर होने के कारण छात्र-छात्राओं को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसका सबसे ज्यादा असर बेटियों की शिक्षा पर पड़ता है।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि गांवों में स्कूलों, शिक्षकों और पुस्तकालयों की मांग उतनी मजबूती से उठे, जितनी अन्य मुद्दों पर उठती है, तो ग्रामीण क्षेत्रों की तस्वीर बदल सकती है। शिक्षा ही वह माध्यम है जो गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक बुराइयों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकती है।
शराब की बढ़ती पहुंच, परिवारों पर बढ़ता बोझ
दूसरी ओर गांवों और कस्बों में शराब की आसान उपलब्धता सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को बढ़ा रही है। ग्रामीणों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि शराब की बढ़ती खपत से परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा नशे में खर्च हो रहा है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है।
कई अभिभावकों का कहना है कि जिस धन से बच्चों की फीस, किताबें और अन्य आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं, वही पैसा शराब में बर्बाद हो रहा है। इसका असर केवल वर्तमान पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी पड़ रहा है।
जहां स्कूलों से ज्यादा शराब दुकानों की चर्चा हो, वहां चिंता स्वाभाविक
शिक्षाविदों का मानना है कि किसी भी समाज की प्राथमिकताएं उसके भविष्य को तय करती हैं। यदि गांवों में स्कूल, खेल मैदान, पुस्तकालय और कौशल विकास केंद्रों की अपेक्षा शराब दुकानों की मांग अधिक चर्चा में रहने लगे, तो यह एक गंभीर सामाजिक संकेत है। बच्चों और युवाओं का व्यक्तित्व उनके आसपास के वातावरण से निर्मित होता है। यदि उन्हें शिक्षा, खेल, संस्कृति और सकारात्मक गतिविधियों का माहौल मिलेगा तो वे बेहतर नागरिक बनेंगे। लेकिन यदि नशे का वातावरण बढ़ेगा तो उसके दुष्परिणाम भी समाज को भुगतने पड़ सकते हैं।
शिक्षा को बनाना होगा जनआंदोलन
सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि सरकार और प्रशासन को ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को लेकर विशेष अभियान चलाने की जरूरत है। नए विद्यालय, छात्रावास, डिजिटल शिक्षा केंद्र, पुस्तकालय और खेल सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। साथ ही शिक्षा के महत्व को लेकर व्यापक जनजागरण अभियान भी चलाना होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों प्रतिभाशाली बच्चे हैं, जिन्हें केवल अवसर और संसाधनों की आवश्यकता है। यदि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुकूल वातावरण मिले तो वे गांव, जिला और राज्य का नाम रोशन कर सकते हैं।
भविष्य का फैसला गांवों को ही करना होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि शासन की नीतियों के साथ-साथ समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। यह तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ी को कैसी विरासत दी जाए—शिक्षा, ज्ञान और अवसरों की या फिर नशे और सामाजिक समस्याओं की।

