राजनांदगांव।सोन कुमार सिन्हा - कभी जिस परिवार के आंगन में नक्सली हिंसा ने मातम बिछाया था, आज उसी घर से शिक्षा और उम्मीद की नई किरण निकल रही है। नक्सल हिंसा में अपने दादा को खोने वाली पोतियां अब हाथों में किताबें लेकर स्कूल पहुंच रही हैं और पूरे समाज को यह संदेश दे रही हैं नक्सलवाद खत्म शिक्षावाद शुरू... शिक्षा पाने स्कूल चले हम।"ल्य राजनांदगांव जिले के धीरेन्द्र बबला साहू और रामचंद्र सिन्हा के परिवार ने नक्सली हिंसा की वह त्रासदी झेली, जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। परिवार के बुजुर्ग सदस्य की शहादत का दर्द आज भी उनके दिलों में है, लेकिन उन्होंने बदले की राह नहीं, बल्कि शिक्षा, शांति और विकास का रास्ता चुना।आज परिवार की नन्हीं बेटियां स्कूल ड्रेस में किताबें लेकर पढ़ाई की ओर बढ़ रही हैं। यह दृश्य केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलते माहौल और नई सोच का प्रतीक बन गया है। यह तस्वीर बता रही है कि बंदूक नहीं, शिक्षा ही भविष्य बदल सकती है। वर्षों तक हिंसा और भय से जूझते रहे इन इलाकों में अब विकास की नई तस्वीर दिखाई दे रही है। केंद्र और राज्य सरकार की पहल से गांवों तक सड़क, बिजली, पेयजल, स्कूल, छात्रावास और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंच रही हैं। इसके साथ ही शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ने से लोगों का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास भी मजबूत हुआ है। छत्तीसगढ़ सेवा कल्याण परिषद से जुड़े लोगों का कहना है कि शिक्षा ही वह ताकत है, जो आने वाली पीढ़ी को हिंसा और भटकाव से दूर रख सकती है। जिस समाज के बच्चे स्कूल जाएंगे, वहां विकास अपने आप रास्ता बना लेगा. सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि नक्सलवाद का स्थायी समाधान केवल सुरक्षा अभियान नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जागरूकता है। जब बच्चों के हाथों में किताबें होंगी, तभी वे अपने अधिकारों, कर्तव्यों और बेहतर भविष्य को समझ पाएंगे। परिवार का कहना है कि जिन्होंने हिंसा का दर्द सहा है, वे शांति की कीमत सबसे बेहतर जानते हैं। इसलिए उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि आने वाली पीढ़ी केवल शिक्षा, संस्कार और विकास के रास्ते पर आगे बढ़े। दादा की शहादत का दर्द आज भी परिवार के दिल में जिंदा है, लेकिन पोतियों के हाथों में किताबें यह साबित कर रही हैं कि हिंसा कभी भविष्य नहीं बनाती। भविष्य का निर्माण केवल शिक्षा, शांति और विकास से होता है।
Loading...

