खैरागढ़। सरकार की बहुप्रचारित प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य हर गरीब को पक्का मकान उपलब्ध कराना है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। कई पात्र हितग्राहियों के लिए यह योजना सिर्फ कागजों पर ही साकार होती दिख रही है। इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर ग्राम मरकाम टोला की रहने वाली 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला रुहनी बाई सतनामी हैं, जो चार वर्षों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुकी हैं। बावजूद इसके उन्हें आज तक उनका पक्का मकान नहीं मिल पाया।
रुहनी बाई का जीवन पहले सामान्य था। उन्होंने अपने बेटों को बड़े प्यार से पाला-पोसा, उन्हें अच्छा जीवन देने की पूरी कोशिश की। लेकिन जब बुढ़ापे में उन्होंने अपने बेटों से सहारे की उम्मीद की, तो वही बेटे उन्हें अकेला छोड़कर चल दिए। सिर्फ अकेला ही नहीं छोड़ा, बल्कि उनकी सारी संपत्ति—खेत और पुश्तैनी मकान भी हड़प लिया। बेटों ने मां की भावनाओं के साथ-साथ उनकी जमीन का भी सौदा कर दिया।
बेटों की बेरुखी के बाद भी रुहनी बाई किसी तरह अपना जीवनयापन कर रही थीं। लेकिन दो साल पहले आई भारी बारिश ने उनकी बची-खुची आस भी छीन ली। उनका कच्चा मकान ढह गया, और वे पूरी तरह बेघर हो गईं। अब उनके पास न रहने का ठिकाना है और न ही कोई सहारा। मजबूरी में वे एक घास-फूस की झोपड़ी में रहने को विवश हैं। वहां हर दिन उनके लिए किसी संघर्ष से कम नहीं।
चार साल पहले जब किसी ने उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना की जानकारी दी, तो उनकी आंखों में उम्मीद जगी। उन्होंने योजना के तहत आवेदन किया, और आश्चर्य की बात यह रही कि उनका आवास स्वीकृत भी हो गया। लेकिन कागजों में स्वीकृति मिलने के बावजूद आज तक उन्हें मकान नहीं मिल पाया।
रुहनी बाई ने कई बार जनपद पंचायत, जिला पंचायत, यहां तक कि कलेक्टर कार्यालय तक गुहार लगाई। हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन दिया गया कि जल्द ही उनका मकान बनेगा, लेकिन चार साल बीत गए और नतीजा आज भी शून्य है।
अब उनकी हालत ऐसी हो गई है कि न तो बेटों ने उन्हें अपनाया, और न ही सरकार उनकी सुध ले रही है। बुढ़ापे में अकेली छूट चुकीं रुहनी बाई के लिए यह स्थिति किसी दोहरी पीड़ा से कम नहीं।
रुहनी बाई ने प्रशासन से अपील की है कि उनकी दुर्दशा को देखते हुए जल्द से जल्द प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनका मकान बनाया जाए। सरकार की यह बहुचर्चित योजना यदि जरूरतमंदों तक समय पर नहीं पहुंची, तो इसका असली उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब तक रुहनी बाई की गुहार सुनता है, या फिर वे यूं ही सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटती रहेंगी?

