सुपरवाइजर-संयुक्त समूह का गठजोड़, बच्चे बढ़ा-बढ़ाकर फाड़े जा रहे फर्जी बिल
खैरागढ़ | आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को पोषण के लिए जारी गर्म भोजन योजना भ्रष्टाचार की भट्टी में झुलस रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत खैरागढ़ ब्लॉक के लगभग सभी सेक्टरों में बच्चों की संख्या मनमाने ढंग से बढ़ाकर लाखों की राशि का बंदरबांट किया गया। सबसे हैरानी की बात ये है कि इस गोरखधंधे में निगरानी करने वाले ही शामिल पाए गए हैं।
ठेलकाडीह के बाद अब पांडादाह सेक्टर में खुली पोल
ठेलकाडीह सेक्टर में गर्म भोजन के नाम पर हुए फर्जीवाड़े की पुष्टि के बाद अब पांडादाह सेक्टर में भी बड़े पैमाने पर घोटाले का खुलासा हो रहा है। विभागीय रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में भारी अंतर देखने को मिल रहा है।
आंकड़ों की जुबानी—कैसे खेला गया खेल
सिवनी (पांडादाह): अप्रैल 2023 में 15 दर्ज बच्चों के बदले 21 बच्चों को प्रतिदिन भोजन दिखाया गया।
चंगुर्दा: जुलाई 2023 में 24 पंजीकृत बच्चों के स्थान पर 25 बच्चों को भोजन कराने का फर्जी रिकॉर्ड।
अचानकपुर नवागांव: दिसम्बर 2022 में 42 दर्ज, लेकिन रिपोर्ट में 47 को खाना खिलाने का दावा।
आंबा: सितम्बर, नवम्बर और दिसम्बर 2022—हर महीने बच्चों की संख्या बढ़ाकर फर्जी रिपोर्ट तैयार की गई।
ईटार के तीनों केन्द्रों में महीनों चला फर्जीवाड़ा
ईटार के आंगनबाड़ी केन्द्र क्रमांक 1, 2 और 3 में 3, 6 और 2 महीनों तक लगातार फर्जी रिपोर्ट पेश कर लाखों का खेल रचा गया। इसी तरह भरतपुर के दोनों केन्द्रों में दो-दो माह तक सुपरवाइजर की मिलीभगत से रिकॉर्ड में गड़बड़ी की गई।
हर केन्द्र में एक ही पैटर्न—कम बच्चे, ज्यादा खाना
बेन्द्रीडीह, सांकरा, बांकलसर्रा, चिचका, रंगकठेरा, पिरचापहाड़ जैसे केन्द्रों में हर जगह 2 से 10 बच्चों तक की अतिरिक्त संख्या दिखाकर पैसे निकाले गए। कहीं 15 बच्चों को 24 दिखाया गया, तो कहीं 11 को 14 बनाकर खाना बांटने का दिखावा किया गया।
प्रशासनिक चुप्पी—क्यों नहीं हो रही कार्रवाई?
चौंकाने वाली बात यह है कि इन सबके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन हैं। जब ठेलकाडीह में गड़बड़ी उजागर हुई थी, तब जिला परियोजना अधिकारी प्रीतराम खुटेल ने "शिकायत मिली तो जांच होगी" कहकर बात टाल दी थी। लेकिन मीडिया में मामला आने के बाद ब्लॉक परियोजना अधिकारी को 4 दिन में रिपोर्ट सौंपने का आदेश देना पड़ा।
क्या कहती है जनता?
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब बच्चों की संख्या में इतना बड़ा फर्क है, तो यह स्पष्ट भ्रष्टाचार है। “आंगनबाड़ी के नाम पर बच्चों को खाना नहीं, कागजों में घोटाला परोसा जा रहा है,” एक अभिभावक ने गुस्से में कहा।
अब देखना होगा कि जांच के नाम पर फाइलें धूल फांकती हैं या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होती है। फिलहाल तो यही सवाल खड़ा है—क्या अफसरशाही के संरक्षण में पल रहा है ये ‘भोजन घोटाला’?

