खैरागढ़ - एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क, छोटे झाड़ के जंगल और कथित अवैध प्लाटिंग से जुड़े जिले के सबसे बहुचर्चित जमीन विवाद में सामने आए दस्तावेज ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। रियासत के भारत संघ में विलय दौरान वर्ष 1947/48 में तैयार की गई शासक की निजी संपत्तियों की सूची में एडवर्ड पार्क का नाम नही है जिसके चलते जमीन के मूल स्वामित्व पर नए सवाल ने जन्म ले लिया है।
जमीन के मूल स्वामित्व पर नए सवाल ने लिया जन्म
गौरतलब है कि अभी तक राजनांदगाँव कवर्धा मेन रोड मे सिविल कोर्ट के सामने एक लाख वर्गफीट से ज्यादा जमीन में विवाद का केंद्र मेंटेनेंस खसरा, रजिस्ट्री, नामांतरण और अवैध प्लाटिंग था, लेकिन अब नया सवाल उठ खड़ा हुआ है कि यदि एडवर्ड पार्क वास्तव में राजपरिवार की निजी संपत्ति थी तो उसका नाम रियासत विलय के समय तैयार की गई आधिकारिक निजी संपत्ति वाली सूची में क्यों नहीं है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 1947/48 में तैयार निजी संपत्ति सूची में कमल विलास पैलेस, लाल निवास, लाल बाग डोंगरगढ़, विभिन्न भवन, भूखंड और उद्यानों का विस्तृत उल्लेख है। दस्तावेजों में उद्यानों के लिए अलग श्रेणी बनाकर महाराज बाग, रानी बाग और रामानुज बाग जैसी संपत्तियों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से एडवर्ड पार्क का नाम सूची में दिखाई नहीं देता।
संघ में विलय के दौरान बनी थी सूची
ऐतिहासिक दस्तावेजों में उल्लेखित यही तथ्य अब पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है कि एडवर्ड पार्क यदि तत्कालीन राजा बहादुर की निजी संपत्ति थी तो सूची में नाम किस कारण दर्ज नही है। जमीन मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि रियासत विलय के समय निजी संपत्तियों की सूची महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसी सूची के आधार पर तय किया गया था कि कौन सी संपत्ति शासक परिवार की निजी होगी और कौन-सी सार्वजनिक अथवा शासकीय श्रेणी में जाएगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि एडवर्ड पार्क वास्तव में राजा की निजी संपत्ति थी तो उसका नाम सूची में होना चाहिए था और यदि उसका नाम नहीं है, तो लगभग 25 साल बाद उसका निजी स्वामित्व का दावा किस आधार पर बना और किस आधार पर बकायदा 1974 में रजिस्ट्री हुई और उसी के आधार पर जमीन का हस्तांतरण और बाद में विक्रय का दावा किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर 1947/48 की निजी संपत्ति सूची में एडवर्ड पार्क का नाम नहीं मिलने से अब दोनों महत्वपूर्ण दस्तावेज आमने-सामने हैं। जिसमे एक पक्ष 1974 की रजिस्ट्री और बाद के राजस्व अभिलेखों को आधार बना रहा है, जबकि दूसरा पक्ष पूछ रहा है कि यदि संपत्ति मूल रूप से निजी थी तो उसका उल्लेख रियासतकालीन निजी संपत्ति सूची में दर्ज क्यों नहीं है।
नामांतरण के दौरान दबाव की राजनीति से बिगाड़ा खेल
एक लाख वर्गफीट जमीन का खेला कभी सामने भी नही आता क्योकि मामले से जुड़े लोगों के रसूख के सामने आम आदमी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, लेकिन कहते है लालच बुरी बला है तो इस खुलासे में भी यही लालच मामले की परत दर परत कलई खोल रहा है। अब आम आदमी सवाल पूछ रहा कि जब ढाई डिसमिल सरकारी जमीन का पट्टा लेने में सालों लग जाता है तो इस मामले में रहमदिली क्यो दिखाई गई हालांकि रजिस्ट्री के लिए नकल देने वाले आर आई के खिलाफ विभागीय जाँच जारी है जबकि पंजीयक के खिलाफ कारवाई के लिए पत्र व्यवहार कर रहा है। भूस्वामी द्वारा बेचे सत्रह भूखंडों का नामांतरण हो गया है जबकि खेल में शामिल भाजपा पार्षद द्वारा पहले जमीन लेकर लाभ कमाने की नीयत से बेचे चार भूखंडों को नामांतरण प्रशासन ने निरस्त कर दिया है। जमीन विवाद से जुड़े लोगों के बीच अब यह चर्चा भी हो रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि समय के साथ राजस्व रिकॉर्ड की विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से निजी स्वामित्व के रूप में दर्ज होती चली गई हालांकि इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष केवल आधिकारिक जांच और अभिलेख परीक्षण के बाद ही सामने आ सकता है लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों में विरोधाभास आम आदमी के समझ से परे हो गया है। इस स्थिति में जमीन की वास्तविक मूल स्थिति स्पष्ट करने विलय के दौरान रियासत से हुए समझौते, उस समय का बंदोबस्त रिकार्ड, मूल राजस्व अभिनलेख, रजिस्ट्री का आधार, नामांतरण की प्रक्रिया, नजूल रिकार्ड, मेंटनेस खसरा, टीएनसी के अभिलेख सहित 1947/48 के दौरान तैयार की गई रूलर्स प्राइवेट प्रॉपर्टी इन्वेंटरीका संयुक्त परीक्षण आवश्यक होगा। भारत संघ में विलय दौरान राजा की निजी संपत्ति सूची में महाराज बाग, रानी बाग और रामानुज बाग दर्ज हैं, लेकिन एडवर्ड पार्क का नामों निशान नहीं है।
सरकारी जमीन को अपना बताकर अवैध प्लाटिंग करने वाले मामले में जो भी सलिप्त है उसके खिलाफ नियमानुसार कारवाई होनी चाहिये। अन्यथा स्थिति में विधानसभा में सरकार को जवाब देना होगा।
-यशोदा वर्मा, विधायक
अवैध प्लाटिंग को लेकर नगर पालिका कोई कारवाई करेगा इसकी संभावना नहीं के बराबर है। जिला प्रशासन से मिले पत्र का जवाब देने में आठ महीने लगा देने वाली नपा प्रशासन वही करेंगी जो वहा काबिज भाजपा नेता कहेंगे।
अब्दुल रज्जाक खान, उपाध्यक्ष नपा
गलत ढंग से यदि जमीन का नामांतरण और उसके बाद अवैध प्लाटिंग की नीयत से बिक्री हुई है तो सारे नए पुराने दस्तावेजों का परीक्षण कर जिम्मेदारों पर कारवाई होनी चाहिए। -
डॉ अरूण भारद्वाज, अध्यक्ष कांग्रेस कमेटी

