डोंगरगढ़ सोन कुमार सिन्हा। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर देवार समाज, ग्राम पथरी द्वारा प्राचीन महावीर तालाब में भव्य जोत-जवारा विसर्जन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वर्ष की खास बात यह रही कि परंपरागत रूप से महिलाओं द्वारा उठाई जाने वाली 'जोत' को इस बार पुरुषों ने उठाया, जिसने समाज में नई पहल के रूप में एक नई परंपरा की शुरुआत की। कार्यक्रम में देवार समाज की गहरी आस्था और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला। कुल देवी-देवताओं — बुड़ी माता, रिक्षिन, कंकालिन, दुलहा देवता, खैरागढ़िया देश फिर्नतीन और दंतेश्वरी दीई — की पूजा-अर्चना के साथ जोत-जवारा स्थापित कर विसर्जित किया गया। पारंपरिक वेशभूषा, मंत्रोच्चार और भक्ति गीतों के साथ डोंगरगढ़ नगर क्षेत्र सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में देवार समाज के सदस्य उपस्थित हुए। समाज के युवाओं में भी परंपरा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। युवा अरविंद देवार ने बताया कि वह देवार समाज की पूजा-पद्धति और धार्मिक नियमों पर आधारित एक पुस्तक तैयार कर रहे हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी परंपराओं को समझ सकें और उन्हें अपनाएं। अरविंद ने कहा, “जवारा केवल त्यौहार नहीं, यह हमारी आस्था, परंपरा और कुल देवी-देवताओं के प्रति सम्मान का प्रतीक है।” देवार समाज के वरिष्ठजन प्रेमलाल देवार, देवीलाल देवार, सोशन देवार, धनु देवार और मनहरन देवार ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। घर की सुख-शांति, संतान सुख और समृद्धि के लिए कुल देवी-देवताओं से प्रार्थना कर जवारा स्थापना की जाती है और अंत में तालाब में उसका विसर्जन किया जाता है। देवार समाज के बुजुर्गों ने स्पष्ट किया कि जवारा कोई खेल-तमाशा नहीं, बल्कि यह एक धार्मिक क्रिया है जो समाज की आत्मा से जुड़ी हुई है। डांग देवी-देवताओं को उनके डेहरी (स्थानीय स्थान) से बुलाकर पूरे विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है।
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